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==समय== विद्यापति के जनम भा निधन के बारे में लिखित रूप से कुछ ना मिले ला, एही कारन इनके समय अनुमान के बिसय हवे{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|1999|p=1}} आ कई किसिम के अनुमान कई आधार प लगावल जाला। उपलब्ध साक्ष्य के हवाला से, [[रामधारी सिंह दिनकर]] इनके जनम 1350 ईसवी के आसपास भइल होखी अइसन लिखे लें।{{sfn|रामधारी सिंह दिनकर|2008|p=11}} डाकटर सुभद्र झा के मत के अनुसार, विद्यापति के काल 1352 ईसवी से 1448 ईसवी हवे।<ref name="ignca">{{cite web|last1=मिश्र|first1=पूनम|title=विद्यापति: कृतित्व एवं जीवन, एक परिचय|url=http://www.ignca.nic.in/coilnet/vp001.htm|website=ignca.nic.in|publisher=Indira Gandhi National Centre for the Arts|accessdate=5 मार्च 2018|language=hi}}</ref> इहे तारीख अंगरेजी के प्रसिद्ध ज्ञानकोश ब्रिटैनिका एनसाइक्लोपीडिया प भी मिले ला।<ref name="britannica">{{cite web|title=Vidyapati: Indian writer and poet|url=https://www.britannica.com/biography/Vidyapati-Indian-writer-and-poet|website=britannica.com|publisher=एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका (ऑनलाइन)|accessdate=5 मार्च 2018|language=en}}</ref> सभसे बिशद बिबरन प्रस्तुत कइले बाने शिवप्रसाद सिंह, जे विद्यापति प किताब लिखलें।{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|2007|pp=46-55}} इनके द्वारा सोझा रखल गइल बिबिध मत के तुलना अनुसार, विद्यापति के रचना ''कीर्तिलता'' में बिबरन मिले ला कि राजा गणेश्वर के निधन लक्ष्मण संवत 252 में भइल आ ई अनुमान मानल जाला कि एह समय विद्यापति के उमिर दस बारह बरिस के रहल, यानी कि इनके जनम लगभग 242 लक्ष्मण संवत में भइल होखी। समस्या ई बा कि लक्ष्मण संवत कब सुरू भइल एहू में बिबाद बा। कुछ अनुमान के मोताबिक एह परमान के आधार प विद्यापति के जनम के तिथी 1360 ईसवी के आसपास मान लिहल गइल, काहें कि लक्ष्मण संवत के सुरुआत पर अलग-अलग मत के अनुसार 1106 से 1119 ईसवी मानल जाला आ एह तरीका से गणेश्वर के निधन के तिथी 1358 से 1371 ईसवी के बिचा में ठहरे ले। हालाँकि, शिवप्रसाद सिंह ''कीर्तिलता'' के आधार पर विद्यापति के समय के निर्धारण के ठीक ना बुझे लें आ कई लोगन के मत के परिच्छा करे के बाद आपन मत देलें कि इनके जनम 1373 ईसवी के आसपास भइल होखे ई संभव बा।{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|2007|p=51}}{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|1999|p=194}}<ref name="ignca" /> एही तरह से इनके निधन के तिथी के बारे में भी अनुमाने लगावल जाला। लखनसेन नाँव के कवी के कविता के हवाला से अनुमान लगावे पर शिवप्रसाद सिंह बतावे लें कि एह आधार पर विद्यापति के निधन 1424 ईसवी के आसपास ठहरे ला; हालाँकि ऊ खुदे एह बारे में लिखे लें कि ई विद्यापति के अंतिम समय मानल ठीक ना बुझाला। कुछ जगह ई बिबरन मिले ला कि विद्यापति लक्ष्मण संवत 299 (1418 ईसवी, अगर लक्ष्मण संवत के सुरुआत 1119 ईसवी मानल जाय) में ''लिखनावली'' ग्रंथ पूरा कइलेन आ 309 में भागवत के एगो प्रति लिख के पूरा कइलें, यानी एह आधार प ऊ 1428 ईसवी तक जियत रहलें। एही कारण सिंह, लखनसेन के आधार पर 1424 वाल मत ठीक ना माने लें, बस एकरा के एगो मत के रूप में लोगन के सोझा रखे लें।{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|1999|p=198}} अन्य कथा के हवाला दे के लिखे लें कि राजा शिवसिंह के निधन के बत्तीस बरिस बाद विद्यापति एगो सपना देखलें आ उनके आपन मउअत नगीचे बुझाए लागल, यानी शिवसिंह के निधन भइल 1415 में आ एह में 32 जोड़ल जाय तब विद्यापति के निधन 1447 ईसवी के कुछ समय बाद भइल होखी।{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|1999|p=196}}<ref name="ignca" /> अउरी दूसर मत सभ में डॉ. बिमानबिहारी मजुमदार विद्यापति के जनम 1380 ईसवी आ निधन 1460 के बाद कबो भइल माने लें; नगेन्द्रनाथ गुप्त 1440 के इनके निधन तिथी माने लें आ उमेश मिश्र इनके निधन के तिथी 1466 के बाद ले माने लें।<ref name="ignca" /> हालाँकि, मजुमदार अपना बिचार में 1460 के बाद बिद्यापति के होखे के बात के खंडन करे लें। मजुमदार के मोताबिक विद्यापति के जिनगी के महत्व वाला घटना सभ के क्रम बा: 1380 के आसपास इनके जनम, 1395-96 ईसवी के आसपास पद लिख के गियासुद्दीन आ नसरत शाह के समर्पित कइल, 1397 में सुलतान जौनपुर द्वारा तिरहुत जीतल गइल जेकरे पहिले ई दुनों पद लिखल गइल रहलें; 1400 के आसपास ''भूपरिक्रमा'' के रचना, 1402-04 के बीच इब्राहिम शाह द्वारा तिरहुत के सिंघासन पर कीर्तिसिंह के स्थापित कइल आ ओही समय के आसपास ''कीर्तिलता'' के रचना; 1410 से 1414 के बीच शिवसिंह के राज्यकाल में दू सौ पद सभ के रचना; 1440 से 1460 के बीच ''विभागसागर'', ''दान-वाक्यावली'', आ ''दुर्गाभक्ति तरंगिणी'' के रचना।{{sfn|शिवप्रसाद सिंह|2007|pp=53-54}} [[हिंदी साहित्य]] के परंपरा में, विद्यापति के समय "आदिकाल" में परे ला। आदिकाल के दूसर नाँव "वीरगाथा काल" भी हवे, हालाँकि, विद्यापति के काब्य के बीरगाथा से कवनो तालमेल ना बा, साथे-साथ ई एह काल के समाप्ति के बाद ले रहलें अइसन भी बिचार कइल जाला, यानी लोग इनके आदिकाल में रखे पर संतोख ना करे ला। आदिकाल के बाद के समय के "भक्तिकाल" मानल जाला, जबकि रामचंद्र शुक्ल इनका के भक्ति वाला कवी ना माने लें।{{sfn|रामचंद्र शुक्ल|2010|p=37}} शुक्ल जी के अइसन बिचार के कारन विद्यापति के शृंगार प्रधान रचना बा।{{efn|शुकुल जी के कहनाम कोट कइल जाला कि "विद्यापति के पद अधिकतर शृंगार के ही हैं जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गीतकाव्य के अनुकरण पर ही शायद की गई है। इनका माधुर्य अद्भूत है। विद्यापति शैव थे। इन्होंने इन पदों की रचना शृंगार काव्य की दृष्टि से की है, भक्त के रूप में नहीं। विद्यापति को कृष्णभक्तों की परंपरा में नहीं समझना चाहिये।"<ref name="dustudy">{{cite web|title=विद्यापति भक्त या शृंगारिक कवि|url=http://vle.du.ac.in/mod/book/print.php?id=12922&chapterid=27770|website=du.ac.in|publisher=दिल्ली विश्वविद्यालय|accessdate=5 मार्च 2018|language=hi}}</ref>}} जबकि [[हजारी प्रसाद द्विवेदी]] शुकुल जी के बिचार के निवारण करे लें आ विद्यापति के भक्ती वाली रचना सभ के पूरबी भाषा सभ के साहित्य पर बाद में परल परभाव के ओर धियान दिवावे लें।{{efn|हजारी प्रसाद जी के हवाला दिहल जाला की, "विद्यापति शृंगार रस के सिद्धवाक कवि थे। उनकी पदावली में राधा और कृष्ण की जिस प्रेमलीला का चित्रण है, वह अपूर्व है। इस वर्णन में प्रेम के शरीर पक्ष की प्रधानता अवश्य है पर इससे सहृदय के चित्त में विकार नहीं उत्पन्न होता बल्कि भावों की सांद्रता और अभिव्यक्ति की प्रेषणगुणिता के कारण वह बहुत ही आकर्षक हो गया है। ...राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंगों को यह पुस्तक प्रथम बार उत्तर भारत में गेय पदों में प्रकाशित करती है। इस पुस्तक के पदों ने आगे चलकर बंगाल, असम, और उड़ीसा के वैष्णव भक्तों को खूब प्रभावित किया और उन प्रदेशों के भक्ति साहित्य में नई प्रेरणा और प्राणधारा संचारित करने में समर्थ हुई। इसीलिए पूर्वी प्रदेशों में सर्वत्र यह पुस्तक धर्म ग्रंथ की महिमा पा सकी।"<ref name="dustudy" />}} कुल मिला के विद्यापति, अपना काब्य के बिसेस्ता के आधार पर ना त आदिकाल के कवी के रूप में साबित होखे लें ना भक्ति काल के बिसेस्ता उनुका रचना में निर्बिबाद रूप से खोजल जा सके ला। दिनकर के कहनाम बा की, ''"...विद्यापति कवनो बर्ग में ना समा सके लें। उनुके सत्कार खाती अइसन सिंघासन चाही जवना प खाली उहे बइठ सके लें। ऊ खाली कबी रहलें आ कबिता में सौंदर्य आ आनंद के छाड़ के ऊ अउरी कवनो बात के जगहा ना दें।"''{{efn|''"विद्यापति किसी भी वर्ग में नहीं समा सकते। उनके सत्कार के लिए ऐसा सिंहासन चाहिए जिस पर केवल वही बैठ सकते हैं। वे केवल कवि थे और कविता में सौन्दर्य और आनन्द को छोड़ कर वे किसी और बात को स्थान नहीं देते थे।"'' रामधारी सिंह दिनकर।{{sfn|रामधारी सिंह दिनकर|2008|p=12}} }}
सारांश:
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भोजपुरीपिडिया:कापीराइट सब
देखीं)।
बिना परमीशन के कॉपीराइट वाली चीज इहाँ कब्बो मत डालीं!
कैंसिल
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