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==प्रोडक्शन== ===बिकास=== 1950 के दशक के अंत में चरित्र अभिनेता नाज़िर हुसैन के मुलाक़ात भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से भइल। राजेंद्र प्रसाद बिहार के रहलें आ भोजपुरी भाषी रहलें, पुछलें कि "काहें ना तू लोग भोजपुरी में फिलिम बनावे लऽ?" एह बात से नाज़िर हुसैन के बल मिलल आ ऊ पहिले से लिख के रखल स्क्रीनप्ले, जेकरा के ऊ पहिले बिमल रॉय के देखा चुकल रहलें<ref name="GHOSH2010"/><ref name="GokulsingDissanayake2013">{{cite book |author1=K. Moti Gokulsing|author2=Adjunct Fellow East-West Center Hawaii Scholar in Residence Wimal Dissanayake|author3=Wimal Dissanayake|title=Routledge Handbook of Indian Cinemas |url=https://books.google.com/books?id=djUFmlFbzFkC&pg=PA155|date=17 अप्रैल 2013|publisher=Routledge|isbn=978-1-136-77284-9|pages=155–}}</ref> पर फिलिम बनावे के सोच लिहलें। बाई चांस नाज़िर हुसैन के मुलकात बिश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी से भइल जे आरा के रहे वाला बिजनेसमैन रहलें। शाहाबादी मुख्य रूप से कोइला के बिजनेस में रहलें आ [[धनबाद]] आ आ [[गिरिडीह|गिरडीह]] में सिनेमा हाल के मालिक रहलें। नाजिर हुसैन उनके फिलिम के कहानी सुनवलें आ शाहाबादी {{INR}} 1.5 लाख के बजट के फिलिम के प्रोड्यूस करे खातिर जुरते तइयार हो गइलें, हालाँकि अंत में एकर खर्चा {{INR}}5 लाख बइठल। कुंदन कुमार, [[बनारस]] से रहलें, ''बड़े घर की बहू'' फिलिम बना चुकल रहलें, एह फिलिम में मुख्य भूमिका में (हीरो के रूप में) चुनल गइलें।<ref name="GHOSH2010"/> ===फिल्मांकन=== फिलिम के मुहूरत शॉट, पटना के शहीद स्मारक पर 16 फरवरी 1961 के फिल्मावल गइल। अगिला दिन से औपचारिक रूप से शूटिंग शुरू हो गइल। फिलिम के ज्यादातर हिस्सा पटना से करीबन 35 किलोमीटर के दूरी पर मौजूद बिहटा गाँव में भइल। कुछ हिस्सा पटना के गोल घर आ [[आरा]] रेलवे टीशन पर फिल्मावल गइल।<ref name="GHOSH2010"/>
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