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===''अवतरण'' मने की गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरल=== [[File:Ravi Varma-Descent of Ganga.jpg|thumb|right|200px|राजा रवि वर्मा के बनावल पेंटिग में "गंगावतरण"]] जेठ के महीना के अँजोर पाख में दसिमी [[तिथि]] के गंगा के अवतरण के परब मनावल जाला जवन अंगरेजी कलेंडर के हिसाब से मई भा जून के महीना में पड़े ला।<ref name=eck1998-p144/> एह दिन लोग गंगा के धरती पर उतरले के तिथि के रूप में मनावेला।<ref name=eck1998-p144>{{Harvnb|Eck|1998|p=144}}</ref> एह दिन के गंगा नहान दस गो पाप के हरे वाला (दसहरा) मानल जाला, या दुसरा मान्यता के अनुसार दस जनम के पाप के धोवे वाला मानल जाला।<ref name=eck1998-p144/> जे गंगा से दूर रहे वाला बा आ गंगा ले ना पहुँच पावेला ऊ लोग कौनों भी स्थानीय नदी में नाहन कर लेला, काहें की हिंदू धर्म में धरती के सगरी जल के गंगा के रूप मानल जाला।<ref name=eck1998-p144/> गंगा के अवतरण के भी कई ठे कहानी कथा प्रचालन में बाटे।<ref name=eck1998-p144/> वैदिक कथा के अनुसार स्वर्ग के राजा इंद्र देव आकासी सर्प रूप वाला वृत्रासुर के बध करिके सोम नामक रस के पृथ्वी पर उतरे के रास्ता बनवलें जवना के ऊ रास्ता रोकले रहे।<ref name=eck1998-p144/> वैष्णव सम्प्रदाय के बहुप्रचलित मत के अनुसार एह कथा में इंद्र के जगह बिष्णु के रखल जाला।<ref name=eck1998-p144/> अइसना में एह स्वर्गीय जल के विष्णुपदी कहला जाला आ गंगा के विष्णु के चरण से उत्पन्न मानल जाला।<ref name=eck1998-p144/><ref>"निकसी हरी के पद पंकज से, अरु संभु जटा में समाय रही है" - तुलसीदास।</ref> ई कथा के मुताबिक, अपने वामन अवतार में पूरा ब्रह्माण्ड के तीन पग में नाप दिहले के बाद अपने पैर से बिष्णु भगवान स्वर्ग (आकाश) के खोद दिहलें जवना से पबित्र धार बहि निकलल आ बर्हमांड में व्याप्त हो गइल।<ref name=eck1998-p144-145>{{Harvnb|Eck|1998|pp=144–145}}</ref> आकाशीय स्वर्ग से निकले के बाद गंगा इंद्र के स्वर्ग में पहुँचल जहाँ ध्रुव ओकरा के प्राप्त कइलें, जे बिष्णु के भक्त रहलें, आ अब आकाश में ध्रुव तारा के रूप में स्थित बाड़ें।<ref name=eck1998-p144-145/> एकरा बाद ई आकाशगंगा के रूप में बहि के चंद्रमा ले पहुँचल।<ref name=eck1998-p144-145/> एकरे बाद गंगा ब्रह्मलोक में पहुचल आ मेरु परबत पर, जवन पृथ्वी में खिलल कमल के रूप में मानल गइल बा, उतर गइल।<ref name=eck1998-p144-145/> इहाँ से एगो पंखुड़ी से एगो धारा भारत वर्ष में अलकनंदा के रूप में बहि निकलल।<ref name=eck1998-p144-145/> हिंदू कथा में अवतरण के कथा में सभसे महत्वपूर्ण स्थान शिव के मिलल बा।<ref name=eck1998-p145>{{Harvnb|Eck|1998|p=145}}</ref> रामायण, महाभारत आ कई ठे पुराणन में बर्णित ई कथा के अंतर्गत कहानी कपिल मुनि के साथ शुरू होले जिनके तपस्या के सगर के साठ हजार लड़िका लोग भंग कई दिहल। क्रोधित होके कपिल मुनि ओह लोग के भसम कई दिहलें आ उन्हन लोग के आत्मा पाताल में भटके खातिर छूट गइल। उनहन लोग बंस में भागीरथ नाँव के राजा भइलें जे अपनी पुरखा लोग के आत्मा के मुक्ती दिवावे खातिर गंगा के स्वर्ग से उतारे खातिर प्रण लिहलें। हालाँकि उनके एकरा खातिर ब्रह्मा आ शिव के तपस्या करे के पड़ल। कहानी के मोताबिक ऊ पहिले बरम्हा के तपस्या कइलें की ऊ गंगा के अपने कमंडल से मुक्त करें जहाँ ऊ बिष्णु के चरण से निकल के स्थापित रहली। ब्रह्मा कहलें की गंगा के तेज बहाव के जमीन पर रोके खातिर पहिले शिव के तइयार करें। ओकरे बाद ऊ शिव के तपस्या कइलें जे अपने जटा में गंगा के रोक लिहलें। एकरा बाद आपन एक ठो लट (अलक) खोल के गंगा के धारा के जमीन पर उतरे दिहलें। आगे-आगे भागीरथ आ पाछे गंगा ओह अस्थान पर पहुँचल लोग जहाँ कपिल मुनि भागीरथ के पुरखा लोग के भसम कइले रहलें। उहाँ, गंगासागर, में गंगा पाताल में प्रवेश कइली आ ऊ लोग के आत्मा मुक्त भइल।<ref name=eck1998-p145/> भागीरथ के द्वारा धरती पर अवतरण के कारन गंगा के नाँव "भागीरथी" पड़ल।<ref name=eck1998-p145/>
सारांश:
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