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===''पहिला अरघ''=== [[चित्र:Preparation - Chhath Puja Ceremony - Baja Kadamtala Ghat - Kolkata 2013-11-09 4242.JPG|160px|thumb|left|पानी में ऊखि गाड़ के पूजा के तइयारी]] [[चित्र:Chhath in Ranipokhari 03.jpg|210px|thumb|right|छठ पूजा के पहिला अरघ के समय जगमग घाट]] [[चित्र:Offerings - Chhath Puja Ceremony - Baja Kadamtala Ghat - Kolkata 2013-11-09 4315.JPG|210px|thumb|सुपेली में रखल परसाद जेह में [[ठेकुआ]] के बिसेस महत्व होला]] ''खरना'' के बाद के रात, आ छठईं तिथी के पूरा दिन आ रात बरत के रात होले। एही छठ तिथी के साँझ बेर नदी, पोखरा के किनारे घाट पर जाइल जाला। घाट पर जा के पूजा के पहिले घरे परसाद बनावल जाला। छठ के परसाद में [[ठेकुआ]] बनावल जाला जे गोहूँ के आटा में मीठा डारि के अ घीव के मोएन दे के दूध में सानल जाला आ सुद्ध घीव में छानल जाला। उत्तरी बिहार में एकरा के खासतौर पर माटी के साफ चूल्हा पर बनावल जाला आ साफ लकड़ी के इस्तेमाल कइल जाला।<ref>{{cite web|url=http://www.festivalsofindia.in/chhatpuja/Chhathpuja-rituals-Hindi.aspx |title=छठपूजा के रसà¥?म रिवाज, छठपूजा नियम, छठपूजा परंपरा |publisher=Festivalsofindia.in |date=2017-08-09 |accessdate=2017-10-15}}</ref> बाकी परसाद में कम से कम तीन किसिम के [[फल]] रहे ला। फल सभ में सिंघाड़ा, गंजी, केला, अनन्नास, गागल नींबू, नरियर, आ मुरई इत्यादि सामिल रहे ला।<ref name="bhaskar1"/><ref>{{cite web|url=https://navbharattimes.indiatimes.com/state/punjab-and-haryana/gurgaon/chhath-puja-special-importance-of-vegetables-in/articleshow/25336452.cms |title=Chhath Puja special importance of vegetables in|छठ पूजन में सब्जियों का विशेष महत्व - Navbharat Times |language=en |publisher=Navbharattimes.indiatimes.com |date= |accessdate=2017-10-15}}</ref> घाट पर पहिले से घर के सवाँग लोग सफाई क के माटी के बेदी बनवले रहे ला लोग। घर से दउरा में सगरी परसाद सामग्री सजा के ले जाइल जाला जहाँ दिया-अगरबत्ती बार के परसाद के सूप में सजा के पूजा कइल जाला आ छठ मइया के गीत गावल जाला। एकरे बाद सुरुज के डूबे से पहिले मेहरारू लोग लगभग कर्हियाइ भर से ऊपर पानी में खड़ा हो के सुरुज भगवान के पूजा करे ला। कुछ जगह, जहाँ छठ मइया के साड़ी चढ़ावे के बिधान भी होला, पानी में पाँच गो ऊखि गाड़ल जालीं जिनहन के पतई आपसे में बान्हल रहे ला आ ओही में साड़ी के सजा के ओकरा पाछे से सुरुज के पूजा कइल जाला। पूजा के बाद सुरुज भगवान के अरघा दिहल जाला। अर्घ में पानी में कई तरह के सुगंधित सामग्री मिला के तामा भा पीतर के लोटा में ले के दुनों हाथ से टिकासन से ऊपर उठा के सुरुज के सोझा धार के रूप में गिरावल जाला जेवना से ओह धार से हो के सुरुज के रोशनी चढ़ावे वाला के देह पर परे। पहिला अर्घा के बाद घाट से सगरी चीज बटोर के घरे आ जाला। कुछ लोग जे संतान खाती मनौती मनले रहे ला एह रात के अँगना में एक तरह के पूजा करे ला जेकरा कोसी भा कोसिया भरल कहल जाला। ''कोसिया'' माटी के एगो खास तरह के बर्तन होला जे कोहा के आकार के होला आ एकरा बरि पर दिया बनल रहे लें। एही में चढ़ावा के सामग्री भर के आ दिया सभ के बार के गीति गावल जाला।
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