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{{Infobox product | title = अबीर | image = Holi shop.jpg | image_size = | alt = रंगीन अबीर के बोरा | caption = [[होली]] खाती बजार में सजल अबीर | type = रंगीन पावडर | inventor = | notes = }} [[File:A celebration of Holi Festival of Colors, Utah United States 2013.jpg|thumb|260px|होली में अबीर उड़ावत लोग|alt=होली मनावत लोग]] '''अबीर''' भा '''गुलाल''', एक तरह के सूखल रंगीन पावडर होला जे हिंदू लोग के पूजा पाठ में देवता लोग के चढ़ावे आ [[होली]] के तिहुआर में एक दूसरा पर रंग लगावे के कामे आवे ला। परंपरागत रूप से ई प्राकृतिक चीज सभ से बनावल जाय। वर्तमान में एह में कई चीज के मिलावट से एकरा के तइयार कइल जाला। बजार में हर्बल अबीर आ सुगंधित अबीर भी मिले ला। ==नाँव== कुछ बिद्वान लोग के अनुसार अबीर शब्द के अरथ अबरक (अभ्रक) हवे जेह में गुलाल मिला के होली खेलल जाला।<ref name="Sumana1973">{{cite book|author=Ambāprasāda Sumana|title=Rāmacaritamānasa: vāgvaibhava: 'Rāmacaritamānasa' kā śabdaśāstrīya evaṃ kāvyaśāstrīya adhyana|url=https://books.google.com/books?id=XvAPAAAAMAAJ|year=1973|publisher=Vijñāna Bhāratī}}</ref><ref name="Pāñcāla1990">{{cite book|author=Śakuntalā Pāñcāla|title=Bihārī kī kāvyabhāshā|url=https://books.google.com/books?id=D-4qAAAAIAAJ|year=1990|publisher=Sāhitya Ratnālaya}}</ref> ==साहित्य में== [[रामचरितमानस]] में ''अबीर'' शब्द एक बेर आइल बतावल जाला।{{efn|रामचरित मानस में - "अगर, धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़े अबीर मनहुँ अरुनारी।।" (बालकांड 165/5)<ref name="Sumana1973" />}} हिंदी के कबी पद्माकर के एगो बिबरन में गोपी के ऊपर एगो लइका अबीर फेंक देला जे आँखी में पर जाला, सखी मेहनत क के आँखि में परल अबीर निकाले ले आ पूछे पर गोपी कहे ले कि अबीर त निकल गइल बाकी ऊ अहीर के लइका आँखी में बस गइल बा जे निकलत ना बा।{{efn|"ए री मेरी बीर जैसे-तैसे इन आँखिन सों; कढ़िगो अबीर पै अहीर को कढ़ै नहीं।" - पद्माकर<ref name="Dwivedi2003">{{cite book|author=Hazari Prasad Dwivedi|title=Vichar Prawah|url=https://books.google.com/books?id=Jiq7N4jEZiEC&pg=PA167|date=September 2003|publisher=Rajkamal Prakashan Pvt Ltd|isbn=978-81-267-0581-8|pages=167–}}</ref>}} [[भोजपुरी]] के [[फगुआ]] के गीतन में अबीर उड़े के उदाहरण मिले ला।{{efn|"बंगला पे उड़े ला अबीर हो लाला..." - बाबू कुँवर सिंह के बीरता के बरनन करे वाला एगो परंपरागत फगुवा से।<ref name="Pathak">{{cite book|author=Sunil Kumar Pathak|title=Chhavi Aur Chhap|url=https://books.google.com/books?id=U4RtCwAAQBAJ&pg=PA175|isbn=978-93-83110-49-0|pages=175–}}</ref>}} {{clear}} ==नोट== <references group="नोट"/> ==संदर्भ== {{Reflist|35em}} [[श्रेणी:होली]] [[श्रेणी:रंग]] {{हिंदू-आधार}}
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