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==प्रकार== भोजपुरी लोकगीतन के [[कृष्ण देव उपाध्याय|कृष्ण देव उपधिया]] चार गो प्रकार में बँटले बाने।<ref name="Upaddhyay1957">{{cite journal|last1=उपाध्याय|first1=कृष्ण देव|title=An Introduction to Bhojpuri Folksongs and Ballads|journal=Midwest Folklore|date=1957|volume=7|issue=2|pages=85-94|publisher=Indiana University Press|language=en|url=http://www.jstor.org/stable/4317636|accessdate=18 जुलाई 2017}}</ref> (1) संस्कार आ रीति-रेवाज से जुडल, (2) बरत-तिहुआर से संबंधित, (3) मौसम आ सीजन के अनुसार गावल जाए वाला, (4) कौनों जाति-समुदाय के गीत, आ (5) दैनिक जीवन के बिबिध कामकाज आ पेशा से जुड़ल गीत। ===संस्कार-रिवाज=== * '''सोहर''': लइका भइला पर भा लइका के जनम से संबंधित मोका पर - जइसे कि छट्ठी, बरही, जनम दिन, [[रामनउमी]], [[जन्माष्टिमी|जन्माष्टमी]] - पर गावल जाये वाला गीत। * '''बियाह के गीति''': [[बियाह]] संस्कार के समय गावल जाये वाला गीत सभ। * '''निर्गुन''': निर्गुन बैराग के भावना आ संसार के मोह छोड़ के सत्य के लखे वाला गीत हवे। आमतौर पर मौअत के समय गावल जाला। पंडित कुमार गंधर्व एकरा के शास्त्रीय गायन के बिधा के रूप में अस्थापित कइलें। भोजपुरी लोकगीत में भरत शर्मा के नब्बे के दशक में सभसे ढेर परसिद्धी एही निर्गुन के गावे से भइल। ===तिहुआर-ब्रत=== * '''पिंड़िया''': विशेष रूप से कुवांरी कन्याओं द्वारा मनावल जाला। जेवना अवसर पर भांति भांति के पिंड़िया के गीत गावल जाला। * '''छठ पूजा''': छठ भोजपुरिया समाज में मनावल जावे वाला एगो प्रमुख त्यौहार ह। इ अवसर पर बहुत सारा पारंपरिक एवं आधुनिक गीत गवाल जाला, जेवना में एगो पारंपरिक गीत " कांच ही बांस के बंहगिया, बहंगी लचकत जाय" बहुत प्रसिद्ध बा। * '''शीतला पूजा''':चैत नवरात्र में मनावे जावे वाला ई त्यौहार में देवीगीत के एकदम भरमार ह। जेमे "निमिया के डढ़ीया मईया लावेली झूलनवा" जैसे पारंपरिक गीत सदियों से गावल जाता। ===समुदाय=== * '''अहिरऊ''' भा '''बिरहा''': अहिर लोग के गीत हवे। बिरहा शब्द के उत्पत्ती कुछ लोग "बिरह" शब्द से मानेला, हालाँकि एह गीत सभ में खाई बिरह के भावना के बर्णन ना मिले ला। बाद के समय में त बिरहा के नाँव पर फिलिमी गाना सभ के तर्ज ले के ओह पर कहानी सुनावे के बिधा के भी बिरहा कहल गइल आ एह तरह के नवका बिरहा के कैसेट अस्सी-नब्बे के दशक में ख़ूब चलन में रहे। * '''गोंडऊ''': गोंड जनजाति के द्वारा शादी बियाह औरि अन्य अवसर पर गावे जाए वाला गीत। * '''धोबी गीत''': धोबी जाति के द्वारा शादी बियाह औरि अन्य अवसर पर गावे जाए वाला गीत। ===मौसमी=== * '''होरी/फगुआ''': [[फागुन]] के महीना में [[होली]] के समय गावल जाये वाला गीत के होरी भा फगुआ कहल जाला। * '''[[चइता|चइता/चइती]]''': [[चइत]] के महीना में गावल जाये वाला गीत। * '''[[कजरी]]''': [[सावन]] की महीना में गावल जाये वाला लोकगीत हउवे। कजरी झुलुआ खेलत समय गावल जाले। छोट बंद के ई गीत तेज आ चंचल लय के होलें। कजरी के दू गो रूप बतावल जाला, मिर्जापुरी कजरी आ बनारसी कजरी जवन उपशास्त्रीय गायन की रूप में गावल जाला। कजरी की गीतन के मुख्य बिसय राधा-कृष्ण के प्रेम, [[रामायण]] के प्रसंग आ ननद-भउजाई के संवाद हवें। ===कामकाज=== * '''जँतसार''': जाँता पीसत घरी मेहरारुन द्वारा गावल जाये वाला गीत। * '''रोपनी- कटनी: धान के रोपनी कटनी करत समय औरतन के द्वारा गावल जाये वाला गीत। * '''कहरवा''': दूल्हा दुल्हन के डोली ढोवत घरी कहारन के द्वारा गावल जाये वाला गीत। ===अन्य बिबिध=== * '''झूमर''': छोट पद वाला गीत जौना के लय चंचल आ ताल के चाल तेज होला। * '''पुरबी''': एगो खास धुन वाला गीत हवें। एक समय में महेन्दर मिसिर के लिखल पुरबी पुरा भोजपुरी इलाका में बहुत चलन में रहे। परसिद्ध गीत - "अँगुरी में डंसले बिया नगिनिया हो..." एगो पुरबी गीत हवे। एकर लय धीरे होले बाकी ताल के ठेका द्रुत गति से चलेला।
सारांश:
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