सहस्त्रबाहु
सहस्त्रबाहु (टेम्पलेट:Lang-sa) चाहे सहस्त्राबाहु हिंदू कथा सभ में एगो काल्पनिक पात्र हऽ, खिसा से अनुसार ऊ रामायण के कथा के पात्र रावण के समकालीन रहे। ई आपन लड़ल सभ जुद्ध जीतल रहे, बाकिर परसुराम से हार गइल रहे। कथा के मोताबिक जमदग्नि ऋषि के आश्रम से जबरन ई कामधेनु नाँव के गाइ उठा ले गइलेन जेकरा चलते परसुराम इनसे जुद्ध कइलेन आ इनके बध दिहलें।[१]
हर साल कातिक महीना के अँजोर में सत्तिमी तिथी के इनकर जयंती मनावल जाला।
नाँव संपादन करीं
सहस्त्रबाहु, जवन कि आमतौर पर बोलल लिखल जाला, इस्पेलिंग के चलते बन गइल उच्चारण आ दूसर इस्पेलिंग हवे; मूल संस्कृत शब्द सहस्रबाहु हवे जहाँ सहस्र माने हजार आ बाहु माने बाँहि होला। देवनागरी के अक्षर स के आगे र जोड़े पर ई कुछ-कुछ त्र नियर लउके ला जेकरा चलते सहस्र के बहुत लोग सहस्त्र पढ़े बोले ला।
कथा के मोताबिक इनके मूल नाँव, जनम के बाद एकवीर रखल गइल रहल। भगवान दत्तात्रेय से इनके हजार भुजा के बल के बरदान मिलल जेकरा चलते इनके सहस्रबाहु नाँव पड़ल।
इनके दूसर नाँव कार्त्तवीर्य-अर्जुन हवे जे कृतवीर्य के बेटा होखे के कारन पड़ल।
उल्लेख संपादन करीं
साहित्य में संपादन करीं
सहस्त्रबाहु के साहित्य में उल्लेख कई जगह मिले ला। सूरदास के रचित सूरसागर में एगो पद में इनके रावण से आ परसुराम से जुद्ध के बिबरन मिले ला।टेम्पलेट:Efn सूरदास के बिबरन अनुसार ई सूर्यवंशी राजा रहलें जे नर्मदा में नहात समय नदी के धारा अपना बाँह से रोक लिहलें, एकरा चलते आसपास ओहिजे कहीं रहत रावण इनका से जुद्ध कइलस आ ई ओकरा के हरा दिहलें। बाद में जमदग्नि रिसी के आश्रम से कामधेनु चोरावे के चलते परशुराम से इनके जुद्ध भइल आ ओह में परशुराम इनके हरा दिहलें।[२]
तुलसीदास के रामचरित मानस में धनुष जग्य के कथा में लछमन-परसुराम संबाद में सहस्त्रबाहु के जिकिर आइल बा जहाँ परसुराम आपन फरसा देखा के कहे लें कि एही से सहस्त्रबाहु के हजार गो बाँह काट दिहले रहलीं।
बाद के इतिहास में संपादन करीं
वर्तमान उत्तर प्रदेश के बदायूँ ज़िला में सहसवान नाँव के जगह बा जेकरा बारे में मानल जाला की ई सहस्त्रबाहु के इलाका रहे आ इहाँ उनके किला रहल।[३][४]
साँसी बिरादरी के लोग, जे मुख्य रूप से राजस्थान में निवास करे ला, अपना के सहस्त्राबाहु के बंसज माने ला।[५]