फगुआ
फगुआ भोजपुरी इलाका में फागुन के महीना में, होली के मौसम में, गावल जाये वाला लोकगीत हवे।[१] जाड़ा के बाद बसंत के आगमन के उछाह आ होली मनावे के तय्यारी फगुआ के गीतन से पता चले ला। बसंत पंचिमी के सम्मत गड़ा जाला आ एही दिन से फगुआ गवाये लागे ला जे लगभग चालीस दिन चले ला, होली के दिन ले।[२][३][४]
कुछ अन्य क्षेत्रन में एकरा के फाग भी कहल जाला। होरी आ रसिया गीत भी एही से मिलत जुलत भावना के गीत होलें।
एक ठो खास अर्थ में, झुंड में फगुआ गावत समय अगर केहू कौनों भुलाइल फगुआ के गीत इयाद क के कढ़ा देला त ओकर फगुआ साथी लोग पर चढ़ गइल अइसन कहल जाला, एह तरह के उधारी के दूसर अइसने फगुआ सुना के उतारल जाला, जेकरा के फगुआ दिहल कहल जाला।[५]
फगुआ के गीत अक्सर शृंगार रस के या भक्ति के गीत होलें जेह में राधा-कृष्ण, राम-सीता या शिव पार्वती के बर्णन होला।[३][६]फागुन में फगुआ मनावे के उल्लेख साहित्य में भी कई जगह मिले ला।[७]
फगुआ मनावे के रिवाज भोजपुरी इलाका ले सीमित नइखे, भोजपुरी भाषा बोले वाला लोग जहाँ दूसरा देस जा के बस गइल उहाँ भी एकर महत्व बाटे।[८]
फागुन आ होली के मौसम में फगुआ के महत्व अब घटत जात बा।[९]
इहो देखल जाय[संपादन करीं | स्रोत संपादित करीं]
संदर्भ[संपादन करीं | स्रोत संपादित करीं]
बाहरी कड़ी[संपादन करीं | स्रोत संपादित करीं]
- कृष्णबिहारी मिश्र, फगुआ की तलाश में, हिन्दी समय पर। टेम्पलेट:In lang